कोरोना महामारी के आने के बाद से करीब 2 दशक बाद एक बार फिर से आर्थिक मंदी को लेकर चर्चा होने लगी है। केवल भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में आर्थिक मंदी के कारण हाहाकार मचा हुआ है। आर्थिक मंदी जब भी आती है तो जनजीवन पर व्यापक असर छोड़ जाती है। कई बार तो मंदी के असर से उबरने में दुनिया को कई साल लग जाते हैं।

अगर आपके जहन में भी यह सवाल उठ रहा है कि ये मंदी क्या बला है और कैसे इससे पीछे छुड़ाया जाए तो आज के इस लेख में आपको इन सभी सवालों के जवाब मिल जाएंगे। साथ ही आर्थिक मंदी के होने के कारण और इससे बचाव के उपायों के बारे में भी इस लेख में विस्तार से जानकारी दी जाएगी।

क्या है आर्थिक मंदी?

मंदी को अगर सरल शब्दों में समझें तो मंदी यानी किसी भी चीज़ का लंबे समय के लिए सुस्त पड़ जाना, और जब इसी को अर्थव्यवस्था के संदर्भ में कहा जाता है तो उसे आर्थिक मंदी कहते हैं। लंबे समय तक जब देश की अर्थव्यवस्था सुस्त पड़ जाती है, तब उस स्थिति को आर्थिक मंदी के रूप में परिभाषित किया जाता है।

बढ़ती महंगाई और ब्याज दरों में लगातार वृद्धि होने से अमेरिका और यूरोपीय देशों में आर्थिक मंदी का खतरा गहराता जा रहा है। कई अर्थशास्त्रियों ने कहा कि यूरोप मंदी की गिरफ्त में जा रहा है। वहीं, अमेरिका में अगले साल तक रेसेशन आ सकता है। अगर अमेरिका में मंदी आई तो इससे दुनिया के सभी देश प्रभावित होंगे और भारत भी इससे अछूता नहीं रहेगा। आज नौकरियों में विशेष रूप से आर्थिक मंदी का प्रभाव देखने को मिल रहा है। गूगल, मैकडॉनल्ड्स, जमैटो, माइक्रोसॉफ्ट जैसी कई बड़ी-छोटी कंपनियों से लाखों कर्मचारियों की छंटनी की जा रही है। लाखों लोग आज बेरोज़गारी की मार झेल रहे हैं और इन सबका प्रमुख कारण आर्थिक मंदी ही है।

आर्थिक मंदी का असर

किसी भी देश का विकास वहां की अर्थव्यवस्था पर निर्भर करता है। अर्थव्यवस्था में लगातार गिरावट होने पर आर्थिक मंदी का दौर आ जाता है। विकसित राष्ट्रों द्वारा किया जाने वाला आयात और निर्यात पर अचानक टैक्स को बढ़ाना और घटाना आर्थिक मंदी का एक स्रोत है, इसका प्रभाव अन्य देशों पर भी पड़ता है। आर्थिक मंदी में वस्तुओं की खपत कम हो जाती है, जिससे उत्पादित माल की बिक्री नहीं हो पाती है। इसका असर कंपनियों पर भी पड़ता है।

शेयर बाज़ार पर दिखता है असर

मंदी के कारण महंगाई और बेरोजगारी बढ़ने का खतरा रहता है। लोगों की आमदनी कम हो जाती है और अर्थव्यवस्था के प्रभावित होने से शेयर बाजार में लगातार गिरावट देखने को मिलती है।

देश की जीडीपी पर पड़ता है असर

जब किसी देश की अर्थव्यवस्था में लगातार दो तिमाहियों में जीडीपी ग्रोथ घटती है, तो उसे टेक्निकली मंदी का नाम दिया जाता है। अगर ये सिलसिला कई तिमाहियों तक जारी रहता है, तो देश में आर्थिक मंदी के हालात बनने लगते हैं। बढ़ती महंगाई को कम करने के लिए ज़्यादातर देशों के केंद्रीय बैंक अपने ब्याज़ दरों में वृद्धि कर रहे हैं। भारत भी उनमें एक है, लेकिन उच्च ब्याज़ दरें आर्थिक गतिविधियों में रुकावट पैदा करती हैं।

कर्मचारियों पर दिखता है असर

आर्थिक मंदी में लोगों के पास पैसे की कमी होती है और वह अपनी जरूरतों को कम करने की कोशिश करता है। इसका नतीजा यह होता है कि मार्केट में डिमांड कम होने लगती है और प्रोडक्ट्स की बिक्री कम होती है। ऐसे में स्वाभाविक है कि जब मांग कम होगी तो उत्पादन पर भी असर पड़ेगा इसलिए कम्पनी अपने लाभ के अनुसार ही कर्मचारियों को रखना चाहेंगी, जिससे कर्मचारियों की छंटनी शुरू हो जाती है, जिससे लाखों की संख्या में लोग बेरोजगार होते हैं।

निवेश पर होता है गहरा असर

आर्थिक मंदी की वजह से निवेश रुक जाता है क्योंकि लोगों की परचेसिंग पावर घट जाती है, साथ ही देश-विदेश से आने वाला निवेश भी कम हो जाता है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, जिससे महंगाई दर और बढ़ती है और लोग अपनी आवश्यकता की चीज़ें नहीं खरीद पाते हैं। डॉलर के मुकाबले रुपये की घटती हुई कीमत भी इसका मुख्य कारण है। मंदी के दौरान आयात के मुकाबले निर्यात में गिरावट होने से देश का राजकोषीय घाटा बढ़ जाता है और विदेशी मुद्रा भंडार में कमी देखने को मिलती है।

आर्थिक मंदी से बचने के उपाय

  • अर्थशास्त्रियों के अनुसार किसी देश को मंदी से निकालने के लिए सबसे पहले उसकी अर्थव्यवस्था में निवेश बढ़ाने की ज़रूरत होती है। अगर निवेश बढ़ता है तो रोज़गार पैदा होगा, लोगों के हाथ में पैसा आएगा और उनकी परचेज़िंग पावर बढ़ेगी।
  • भारत में आयकरदाताओं की संख्या काफी कम है और जो लोग आयकर देते हैं उन्हें आयकर में मामूली कटौती का कोई फर्क नहीं पड़ेगा। इस प्रकार यदि आयकर में कटौती को एक उपाय के रूप में अपनाया जाता है तो इसका फायदा काफी सीमित लोगों तक पहुँचेगा।आयकर में कटौती के स्थान पर ग्रामीण क्षेत्र के अधिक-से-अधिक वित्तपोषण को एक बेहतर विकल्प के रूप में देखा जा सकता है।
  • आर्थिक मंदी का एक मुख्य कारण बेरोजगारी है। शहरी और ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में रोज़गार गारंटी स्कीम के ज़रिए इस समस्या से निपटा जा सकता है। वहीं, इनडायरेक्ट टैक्स जैसे जीएसटी दरों को भी कम करने की ज़रूरत है। अगर उत्पादों पर लगी जीएसटी कम होगी तो लोगों की बचत बढ़ेगी और वो बाज़ार में ज़्यादा निवेश करेंगे।
  • अर्थव्यवस्था में सुधार के लिये देश के वित्तीय क्षेत्र मुख्यतः NBFC में सुधार किया जाना आवश्यक है। पब्लिक सेक्टर में कुछ सुधार किए जाने की जरूरत है। लेकिन MSMEs जैसे कुछ विशेष क्षेत्रों के लिये NBFCs से उधार दिए जाने की जरूरत है।
  • सरकार को जीएसटी रिफॉर्म पर भी सोचने की ज़रूरत है। जीएसटी से असंगठित क्षेत्रों को बहुत धक्का लगा है। इसके अलावा कॉर्पोरेट सेक्टर, जो लगातार मुनाफ़े में हैं, उन पर सरकार को विंडफॉल टैक्स लगाने की ज़रूरत है। विंडफॉल टैक्स एक ऐसी तरह का टैक्स है जिसे सरकार कंपनियों पर लगाती है। जब कंपनी किसी माध्यम से मुनाफ़े में जाती है, तो उसे विंडफॉल प्रॉफिट कहा जाता है।

इन कुछ उपायों की मदद से आर्थिक मंदी को कम किया जा सकता है। इन्हें सही तरह से लागू कर कोई भी देश आर्थिक मंदी की विकट समस्याओं से छुटकारा प्राप्त कर सकता है।


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